पटना विश्वविद्यालय का तिरहुत से एक एतिहासिक संबंध है। महाराजा महेश्वर सिंह के निधन के बाद तिरहुत सरकार का बागडोर अंग्रेजों के हाथ में चला गया था। महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह के वयस्क होने पर दरभंगा उस क्षण का इंतजार कर रहा था जब अंग्रेजों के हाथों से तिरहुत की
जिम्मेंदारी महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह लौट आये। दरभंगा को उस वक्त गहरी निराशा हुई जब पता चला कि सत्ता का यह हस्तानांतरण दरभंगा में नहीं बल्कि पटना में होगा। लक्ष्मेश्वर सिंह की डायरी से ज्ञात होता है कि 25 सितंबर, 1879 को पटना कॉलेज परिसर में तिरहुत की जिम्मेदारी अंग्रेजों ने लक्ष्मेश्वर सिंह को लौटा दी। द बिहार टाइम्स ने भी इस समारोह को तिरहुत के लिए एक बडा बदलाव बताया है। लक्ष्मेश्वर सिंह के कार्यकाल में ही तिरहुत में रेल, जैविक खेती, अंग्रेजी शिक्षा और आधारभूत संरचना पर सबसे पहले काम शुरु हुआ। गांधी और कांग्रेस की मदद करने के साथ ही बहादुरशाह जफर के पोते को पनाह देकर इन्होंने देशप्रेम की वो मिसाल कायम की इसे इतिहासकारों ने भी रेखांकित करने से खुद को रोक नहीं पाये। ईश्वर ने इन्हें मौका ही बहुत कम दिया।
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